"इंसान और इंसानियत"
रिश्तों से बढ़कर धन को माना,
फिर क्यों जीवन वीराना जाना।
मंदिर जाकर शीश झुकाते,
घर आकर अपनों को रुलाते।
माँ की ममता भूल गए सब,
स्वार्थ के आगे झुक गए सब।
जीवों में भी प्राण हैं भाई,
दया से बढ़कर पूजा न भाई।
पत्थर में भगवान दिखाई देते,
पर इंसानों में दोष ही देखते।
फूलों का हार प्रभु को चढ़ाते,
पर प्रेम का हार किसी को न पहनाते।
जीत की चाह में दौड़ रहे हैं,
अपने ही अपनों से दूर रहे हैं।
याद रखो बस इतनी बात,
मानवता ही सबसे बड़ी है जात।
जिस दिन इंसान इंसान को समझ जाएगा,
उसी दिन धरती पर स्वर्ग उतर आएगा।
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