जब न होगा कोई पहरा द्वार पर,
ना उठेंगी उंँगलियांँ सरकार पर।
तू न डरना खतरों से शमशीर के,
आदमी सब जी रहे हैं धार पर।
इस चमन पर राज है जब फूल का,
बारहा आरोप क्यों हो ख़ार पर ।
नज़रें तुमने जब मिला लीं जंग से,
कोई समझौता न करना हार पर।
है सियासत का यही दस्तूर बस,
फेंक दो पत्थर यूंँ ही दो चार पर।
-प्रदीप बहराइची
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