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जब न होगा कोई पहरा द्वार पर,

                
                                                         
                            जब न होगा कोई पहरा द्वार पर,
                                                                 
                            
ना उठेंगी उंँगलियांँ सरकार पर।

तू न डरना खतरों से शमशीर के,
आदमी सब जी रहे हैं धार पर।

इस चमन पर राज है जब फूल का,
बारहा आरोप क्यों हो ख़ार पर ।

नज़रें तुमने जब मिला लीं जंग से,
कोई समझौता न करना हार पर।

है सियासत का यही दस्तूर बस,
फेंक दो पत्थर यूंँ ही दो चार पर।
-प्रदीप बहराइची
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2 महीने पहले

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