कुछ मोड़ पे भटकाव ही, ठहराव नहीं है
कुछ राह मुसाफ़िर को पता अपना बता दे।
वो मोड़ नहीं, जो तुझे मंज़िल से हटाए
ताक़त है कि तुझको तेरी पहचान करा दे।
जब हाथ छुड़ा ले, कोई ओढ़ी हुई पहचान
तन्हाई भी सीने से नए ख़्वाब जगा दे।
तू बदलती हुई राहों से ख़फ़ा क्यों है?
ज़िंदगी जब भी मुड़े, एक नया शख़्स बना दे।
-अपराजिता परम
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