आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रभात के शेर

                
                                                         
                            हमने जमीं का सू-ए-चमन देखा ही नहीं,
                                                                 
                            
परिंदा शाख पर आशियां कैसे बनाएगा।
ये जहां गरज परस्त है वफा कौन करेगा,
तेरी दास्तां लिख आस्मां को कौन बताएगा।।

इन परिंदों की वफा बस आस्मां समझता है,
इंसान अपना वजूद खुद मिटा रहा है अब।
टूटे हुए घुंघरूंओं को कौन देखता है भला,
दिल से निकाला गया हूं कौन आ रहा है अब।।

फुर्कत मिला है मुझे हिजाब किस बात का,
इजहार-ए-हाल का बे-खुदी कर रहा हूं मैं।
अब राज-ए-दिल शोखी़ हो गई है उसकी,
हुस्न-ए-बहारे की तारीफ कर रहा हूं मैं।।

फरेब-ए-वफा में खुद को जहमत उठाना पड़ा,
दिलरुबा की आरज़ू में खुद को झुकाना पड़ा।
इजाजत मांगी थी हमने जख्म देकर गई है वो,
बस राज-ए-दिल का खुद को ही छुपाना पड़ा।।

मैं बर्बाद ए मोहब्बत था दुआ में शामिल न हुआ,
वो मेरे जुर्म ए मोहब्बत में भी शामिल न हुआ।
इकरार ए मोहब्बत की वफा किया करती थी,
नयनों में अश्क भी और मैं भी तन्हा रह गया।।
-प्रभात सनातनी "राज" 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर