भूल जाऊं उन बीते दिनों को
और न पलटू अतीत के पन्ने
कैसे होता है ये भूलना
मैन नही सीख पाए है अभी भी
मैं जीता हूं हर रोज तुझमें
तेरी यादों का कारवाँ गुजरता
हर रोज मेरे मन में
मैं कहना चाहता हुँ
मंजिल अभी शेष है
लेकिन कारवां नही ठहरता
मेरे गम के साथ कुरेद देता है
उन यादों को
जो दफन हो चुकी थी
सदा के लिए
मेरे बीते कल खुलने लगते है
एक-एक सा अचानक
जिन्हें शायद मैं कभी ही
अपने स्मृतियों में चाहता
मेरा स्थिर और शांत मन
मचल उठता है
और
उन यादों के सागर में
गोता लगाता है और
डुब जाता है पूरी तरह
उन अतीत के सुनहरेपन में
जो हमने साथ जिये थे
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