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विरह की अग्नि में

                
                                                         
                            ऐ मतवाली हवा
                                                                 
                            
गुजरी तो होगी
मेरी प्रेयसी की गली से
क्या अभी भी वो गुनगुनाती है मेरा नाम
अपने लबों से
ऐ काले काले बदरा
गुजरे तो होगे तुम भी
मेरी प्रेयसी की गली से
क्या अभी भी उसकी कजरारी आंखें
इंतजार करती है मेरा
ऐ बरखा रानी
बरसी तो होगी तू भी
मेरी प्रेयसी की गली में
क्या अभी भी बरसते हैं
उसके नयना मेरे गम में
ऐ सुरीली कोयलिया
कुहूकी तो होगी तू भी
मेरी प्रेयसी की बगिया में
क्या अभी भी सुनने को तरसती है
वो मेरे प्यार के मीठे शब्दों को
कह देना मेरे बिछड़े प्यार से
काश न मिलते एक दूजे से
न तड़पना पड़ता फिर यूं
विरह की अग्नि में ………
 -सरिता सिंह
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3 महीने पहले

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