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आखिर हैं तो रिश्तेदार हीं

                
                                                         
                            रिश्तों के भी कई रुप होते हैं ।
                                                                 
                            
कुछ बिन कहे मूक बन फर्ज निभाते रहते हैं ।
कुछ कह कर एहसान जता कर निभाते हैं ।
कुछ जब जब जरुरत पड़ती है
भूले बिसरे याद कर लेते हैं ।
कुछ हरदम साथ खड़े रहते हैं
हालात चाहे कैसे भी रहे हो ।
कुछ अच्छे वक्त के ही साथी होते हैं
बुरे वक्त में नदारद रहते हैं ।
कुछ सिर्फ इसलिए नाता रखते हैं
दिल में चाहे कोई जगह न हो
पर……… बस रिश्तेदार जो ठहरे ।
अब भला रिश्तेदार भी कब मांगें से मिले
ऊपर से ही जुड़ कर आते हैं ।
रिश्तेदार हैं ………….…………
जैसे दिल में आए रिश्ता निभाते रहो
आखिर हैं तो रिश्तेदार हीं???
-सरिता सिंह
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3 महीने पहले

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