आईना एक तू ही है
जो मुझे मूक बन सुनता रहता है
मन की सारी बातें तुझ से साझा कर लेती हूं
और तू मेरा कोई आंकलन नहीं करता
कभी कभी कोई बस केवल सुनने वाला चाहिए
मन हल्का हो जाता है
वरना बात केवल एक होती है
दस सुनने को मिल जाती है
-सरिता सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X