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अन्तिम पड़ाव

                
                                                         
                            लाजवाब लाईनें..
                                                                 
                            
इस दुनिया मे कोई किसी का हमदर्द नहीं होता,
लाश को शमशान में रखकर अपने लोग ही
पुछ्ते हैं। "और कितना वक़्त लगेगा"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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