मैं समय की भीगी हुई सीढ़ियों पर
धीरे-धीरे उतरता रहा हूँ—
एक प्रलय से दूसरे प्रलय तक।
सभ्यताओं की राख में
मैंने अर्थ के कुछ अवशेष खोजे,
किन्तु हर उत्तर
अपने भीतर
एक नया शून्य छिपाए था।
कभी लगता था,
मैं ही चेतना का अंतिम दीप हूँ—
अकेला, काँपता हुआ।
मेरे चारों ओर
विचारों का अथाह अंधकार था,
और भीतर
एक असहाय बुद्धि,
जो स्वयं से भी आश्वस्त नहीं थी।
तभी तुम आये—
जैसे किसी निर्जन ग्रंथ में
अचानक मिल जाए
एक जीवित पंक्ति।
तुमने कोई उपदेश नहीं दिया,
केवल मौन के भीतर
एक सूक्ष्म दिशा रख दी।
मैंने पहली बार
अपने प्रश्नों को
इतना शांत देखा।
पर क्या विवेक
सत्य का अंतिम स्वर है?
या वह भी
मनुष्य की भयभीत चेतना द्वारा
गढ़ा गया एक सेतु मात्र?
मैं यह सोचते हुए
रात के विशाल आकाश को देखता हूँ,
जहाँ नक्षत्र भी
अपने अस्तित्व पर
मौन प्रतीत होते हैं।
अब मैं जानता हूँ—
तलाश कभी समाप्त नहीं होती।
मनुष्य केवल चलता है,
अपने ही निर्मित अर्थों के बीच।
कभी बुद्धि उसका हाथ पकड़ती है,
कभी विवेक।
किन्तु अंततः
हर यात्रा
स्वयं के भीतर उतरने की
एक अदृश्य प्रक्रिया बन जाती है।
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