सद्गुण, सम्मान, विवेक—
दुहराए हैं मैंने ये शब्द अनेक बार।
पर एकांत के शून्य में
एक प्रश्न कौंधता है:
क्या ये केवल शब्द हैं,
या किसी अदृश्य सत्य की परछाइयाँ?
संवादों में ये दीपक की तरह जलते हैं,
पर भीतर का अंधेरा डिगता नहीं।
हम आदर्श पूजते हैं, जीते नहीं;
निबंधों में सजाते हैं, अनुभव से रीते हैं।
ग्रंथों में महिमा है इनकी,
पर आचरण का मरुस्थल सूना है।
मन पूछता है स्वयं से—
क्या मेरा चिंतन इतना पंगु है
कि इन अमूर्त अवधारणाओं को
रक्त-मांस का आकार न दे सका?
क्या मैं केवल बौद्धिक श्रद्धा का बंदी हूँ,
कर्म और चेतना की साधना से विमुख?
हम चर्चा करते हैं,
वाद-विवाद की दीवारें चुनते हैं,
सिद्धांतों के महीन ताने-बाने बुनते हैं।
पर जैसे ही जीवन की धूल सामने आती है,
हमारे सुगठित कदम डगमगा जाते हैं।
कैसी विडंबना है!
आदर्शों को आकाश में टाँग दिया,
और स्वयं पृथ्वी की गलियों में भटक रहे हैं।
शायद दोष इन आदर्शों का नहीं,
हमारी चेतना के विखंडित ढांचे का है।
हम सत्य से मुग्ध होते हैं,
पर उसे जीने का साहस नहीं जुटा पाते।
मस्तिष्क तर्क की कड़ियाँ जोड़ता है,
पर हृदय के कपाट खुलते ही नहीं।
मैं अब भी एक अंतहीन खोज में हूँ—
उन अवधारणाओं के मूर्त होने की,
जो विचार लांघकर व्यवहार बन सकें,
जो शब्दों के चोगे से निकलकर
एक जीवंत स्पंदन में साँस ले सकें।
जो मेरे इस ठोस 'मैं' को पिघलाकर
एक असीम अस्तित्व में विलीन कर दे।
शायद उसी अनिश्चित क्षण में,
चर्चा के कोलाहल से परे,
चिंतन वास्तविकता को छू सकेगा।
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