कभी-कभी सोचता हूँ—
क्या शब्द केवल ध्वनियाँ हैं,
या वे उन अदृश्य पथों के यात्री हैं
जो एक बार मुझसे निकलकर
समय की परिक्रमा पर चल पड़ते हैं?
और फिर किसी अपरिचित क्षण में
मेरा ही द्वार खटखटाते हैं।
मैंने अनेक बार कहा है कुछ—
क्रोध में,
अभिमान में,
या स्वयं को सिद्ध करने की उतावली में।
पर क्या वास्तव में वे शब्द
दूसरों तक पहुँचे थे,
या पहले उन्होंने
मेरे ही भीतर कोई दरार बनाई थी?
वाणी का प्रत्येक स्पर्श
किसी न किसी चेतना पर अंकित होता है।
किन्तु रहस्य यह है कि
जिसे मैं दूसरे का हृदय समझकर छूता हूँ,
उसकी प्रतिध्वनि
सबसे पहले मेरे अंतराल में जन्म लेती है।
मैंने देखा है—
कटुता का उच्चारण करते समय
मन क्षणभर के लिए विजयी प्रतीत होता है।
किन्तु बहुत बाद में
उसी विजय की राख से
एक अव्यक्त विषाद उठता है,
और पूछता है—
क्या यह मूल्य उचित था?
शायद शब्द कभी लौटते नहीं,
जैसा हम सोचते हैं।
वे तो यहीं रह जाते हैं—
स्मृतियों, संबंधों और आत्मबोध की परतों में।
लौटता है केवल उनका प्रभाव,
जो समय के किसी मोड़ पर
भाग्य का रूप धर लेता है।
इसलिए अब बोलने से पूर्व
मैं शब्दों को नहीं,
स्वयं को परखने का प्रयास करता हूँ।
क्योंकि प्रश्न यह नहीं कि
मेरी वाणी संसार में क्या बोएगी,
प्रश्न यह है कि
उसके साथ मैं अपने भीतर क्या रोप रहा हूँ—
एक और प्रतिध्वनि,
या एक और मौन।
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