किसी के मन की धड़कन का अर्थ समझ में आ जाए,
तो शब्दों की भीड़ का फिर क्या प्रयोजन रह जाए।
नयन यदि मौन संकेतों की भाषा पढ़ने लगें,
तो हर संवाद का विस्तार स्वयं ही सिमट जाए।
जहाँ विश्वास की सरिता भीतर ही भीतर बहे,
वहाँ संदेह का मरुस्थल कब तक प्यासा रह पाए।
संबंधों का सत्य मुखर उद्घोषों में नहीं मिलता,
एक निस्पंद दृष्टि ही अनेक ग्रंथों पर छा जाए।
हृदय से हृदय तक पहुँचने का पथ इतना दुर्लभ नहीं,
बस अहं का एक आवरण हटे, और जग सरल हो जाए।
किसी के दिल में क्या है, यह यदि सहज समझ में आए,
तो सचमुच फिर इस सारे ज़माने की ज़रूरत क्या रह जाए।
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