आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"जीवन का सुरधनुष"

                
                                                         
                            हृदय के नीरव कोटर में, जब प्रेम-दीप जलता है,
                                                                 
                            
अंधेरों के समंदर में, तभी पथ भी निकलता है।
सपनों का वही सतरंगी, सुकोमल बीज बनकर फिर,
मनुज के शुष्क अंतर में, नया विश्वास फलता है।

सद्भावों की शीतल धारा, मनों को सिंचित करती है,
करुणा की मृदुल वंशी, विषमता क्षीण करती है।
जहाँ अपनत्व जीवित हो, वहाँ ईश्वर स्वयं ठहरे,
परस्पर प्रीति ही जग में, धरा पावन धुरी धरती है।

कठिन पथ की धूल में भी, छिपे इंद्रधनुष रहते,
विपदाओं के तिमिर में भी, सुनहरे स्वप्न बहते।
संकल्पों के प्रदीपक ही, दिशा का बोध कर पाते,
उमंगों के नये अंकुर, संघर्षों बीच ही रहते।

रंगों के तंतु जोड़-जोड़, जगत का व्योम बनता है,
विचारों के मंथन से ही, नया सत्यम् निकलता है।
निरर्थक कुछ नहीं जग में, न पीड़ा व्यर्थ जाती है,
पतझरों की तपन सहकर, वनस्पति फिर सँवरता है।

मिले ऐसा विरल सुकून, जहाँ संशय नहीं ठहरे,
न कोई राग बंधन हो, न अंतर में विषाद ठहरे।
जहाँ कण-कण में चेतन का, मधुर आलोक झरता हो,
वहीं जीवन समाधि-सा, स्वयं आनंद बन ठहरे।

बने जीवन विशाल इतना, कि सीमाएँ स्वयं टूटें,
मनुजता के मधुर स्वर से, विभाजन के सभी सूत टूटें।
सुरधनु के सात स्वरों में, बहे अस्तित्व की सरिता,
मधुर सरगम में ऐसा रमे, कि कालों के भी मूक टूटें।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर