. "हृदय की स्याही, चेतना का स्पं
शब्दों के प्रासाद सजाकर
यदि केवल पन्नों का भार बढ़ा,
तो वह सृजन नहीं—
अक्षरों का निष्प्राण श्रम है।
सच्ची रचना वही,
जो मौन रहकर भी
किसी सूने अंतर्मन में
धीमी गूंज बन जाए।
क्या अर्थ उन महाकाव्यों का,
जिनमें किसी विरही की आह न उतरी?
क्या लाभ उन छंदों का,
जो टूटे हुए मन को
क्षणभर का सहारा भी न दे सके?
रचना की सार्थकता
शब्दों में नहीं,
उस अदृश्य सेतु में है
जहाँ एक हृदय की पीड़ा
दूसरे हृदय की नमी बन जाती है।
लिखना तो केवल निमित्त है,
मूल सत्य है—
भावों का निर्बाध प्रवाह।
जब अनुभूतियाँ
जीवन की अग्नि में तपकर उठती हैं,
तब वे भाषा की सीमाएँ नहीं मानतीं।
वे सीधे उतरती हैं
उस अंतस में,
जहाँ कोई पुराना दर्द
अपने स्वर की प्रतीक्षा करता है।
दुनिया रचनाओं को
पन्नों की मोटाई से तौलती रही,
या प्रशंसाओं के खोखले बाज़ार से।
किन्तु समय—
अपने कठोर और निष्पक्ष हाथों से
केवल उसी को बचाए रखता है,
जो किसी एकांत की प्रार्थना बन सके।
सृजन प्रदर्शन नहीं,
एक मौन स्पर्श है—
जहाँ एक हृदय
बिना शब्दों के
दूसरे हृदय से मिल लेता है।
जब तक शब्द
केवल बुद्धि की उपज हैं,
वे मरुस्थल की रेत-से बिखर जाते हैं।
पर संवेदना में भीगकर
वे चेतना में अंकुरित होते हैं।
महत्व स्याही का नहीं,
उस अमिट स्पर्श का है,
जो किसी अवसादग्रस्त क्षण में
एक शीतल आलोक बनकर
धीरे से उतर आए।
अतः ऐ राही,
मत गिन अपनी रचनाओं की संख्या,
मत माप तालियों की गूंज।
बस इतना पूछ—
क्या तेरी कलम से
किसी आँख का कोना नम हुआ?
क्या किसी भटके मन को
क्षणभर का आश्रय मिला?
क्योंकि जो रचना
दिलों की सीमाएँ लाँघकर
दिलों में ही घर कर ले—
वही अमर है,
वही शाश्वत सृजन है।
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