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भीतर की अग्नि

                
                                                         
                            मैंने भीतर झाँका तो एक अग्नि मौन जलती मिली
                                                                 
                            
जो मुझे हर क्षण मुझसे ही पुनः गढ़ती मिली

यह जीवन सहज प्रवाह नहीं, एक सतत संघर्ष है
जहाँ हर सरलता के नीचे छिपा एक गूढ़ अर्थ है

मैं स्वयं प्रश्न हूँ, और उत्तर भी अधूरा ही सही
मेरी टूटन ही मुझे सत्य के निकट ले जाती रही

यहाँ कोई बाह्य आश्रय नहीं, न कोई अंतिम सहारा
हर अर्थ को मुझे ही भीतर से खोजना पड़ा दोबारा

अकेलापन भी यहाँ एक अदृश्य शक्ति बन जाता है
जो गिरते हुए भी मुझे पुनः खड़ा कर जाता है

सहजता नहीं, यह अस्थिर संघर्ष की वास्तविकता है
जहाँ हर क्षण स्वयं को सिद्ध करने की आवश्यकता है

यह जलन ही मुझे धीरे-धीरे पारदर्शी बनाती है
मेरा अंधकार ही मेरी सबसे सच्ची पहचान बन जाती है

अंततः मैं यही जानता हूँ—होना एक प्रक्रिया है
तपते रहना ही मेरे अस्तित्व की सबसे गहरी व्याख्या है

 
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5 घंटे पहले

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