परिवार पूर्णता का निर्मित स्वर्णिम द्वार नहीं,
यह टूटे मन के लिए मौन खुला संसार कहीं।
जहाँ थके हुए जीवन को आश्रय मिल जाता है,
सूखे अंतर्मन में फिर से सावन खिल जाता है।
यहाँ न कोई निष्कलुष, न कोई सर्वज्ञ होता,
हर मानव अपने भीतर कुछ व्यथा-संग होता।
फिर भी संबंधों का दीपक जलता रहता है,
अपूर्णताओं में भी अपनापन पलता रहता है।
जब जग की कठोर दृष्टि मन को घायल करती,
अपनों की कोमल वाणी संबल बनकर झरती।
वे शब्दों से पहले आँखों की भाषा पढ़ते हैं,
मौन वेदनाओं के कंपन तक भी गढ़ते हैं।
परिवार वही जहाँ असफलता तिरस्कृत न हो,
अश्रु किसी के भी व्यर्थ और उपेक्षित न हों।
जहाँ गिरने पर भी कोई हाथ थमा रहता है,
हर अँधियारे में विश्वास जला रहता है।
वे केवल उत्सव के क्षण में सम्मिलित नहीं होते,
दुःख की वर्षा में भी संग छत बनकर संजोते।
जब भीतर का प्रकाश स्वयं धूमिल पड़ जाए,
वे स्मृतियों के दीपक से जीवन फिर जगमगाएँ।
इसलिए परिवार केवल रक्त-संबंध नहीं है,
यह करुणा, विश्वास, त्यागों का पावन निलय है।
जहाँ मन अपने समस्त आवरण खोल सके,
और बिना कहे भी कोई अंतरतम बोल सके।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X