शिखर से गिरना, पतन नहीं है,
यह तो पावन, समर्पण-क्षण है।
त्याग कर गौरव, पाषाणों का,
धरा की गोदी में, विसर्जन है।
शांत सरिता में, बहते जाना,
सहज जीवन का, स्वीकार भाव है।
बिना प्रतिरोधी, लहर बने ही,
परम धारा से, एकात्म भाव है।
तिमिर को चीरती, सूर्य-रश्मियाँ,
सृष्टि का सनातन, शाश्वत सत्य हैं।
चेतना की इस, विमल आभा में,
सारे भ्रम होते, स्वतः विनष्ट हैं।
थमा देता है, यह भव्य दृश्य,
चंचल चित्त के, व्याकुल स्पंदन।
मौन होकर ही, सुन पाता जीव,
अपने भीतर का, मधुर गुंजन।
मिट रही दूरी, अंश-अंशी की,
व्यष्टि का समष्टि में, विलय महान है।
बूँद का सागर से, मिलन हो रहा,
यही तो प्रकृति का, उत्सव-गान है।
शांत अंतस में, गूँजता संगीत,
सिखाता हमको, सहज जीना।
छोड़ सब संशय, जगत के 'कमल',
सत्य के रस को, अखंड पीना।
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