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"अंतराल का ग्रीष्म"

                
                                                         
                            जब चारों ओर
                                                                 
                            
शीत उतर आया था,
और समय
हिमकणों-सा
निष्पंद हो गया था—
तब पहली बार
मैंने सुना
अपने भीतर
किसी अग्नि का
मंद स्पंदन।

विषाद
केवल दुःख नहीं होता।
वह कभी-कभी
आत्मा पर जमी
एक सफेद निस्तब्धता है,
जिसमें
मनुष्य
अपनी ही पदचाप
खो देता है।

मैं खोजता रहा
ऊष्मा
बाहरी दिशाओं में।
किन्तु ऋतुएँ
किसी के लिए नहीं ठहरतीं।
जो शेष रहता है,
वह भीतर
धीरे-धीरे जलता हुआ
एक अदृश्य ग्रीष्म है।

पतझर ने
मुझसे बहुत कुछ छीना—
पत्ते, छायाएँ,
विश्वास के रंग।
किन्तु उसी ने
सिखाया भी—
वृक्ष
अपने हरापन से नहीं,
जड़ों की नमी से
जीवित रहता है।

हे मन,
तू क्यों भयभीत है
इन हिमाच्छादित दिनों से?
क्या तूने नहीं देखा—
सबसे कठोर शीत में भी
धरती के भीतर
बीज
चुपचाप
वसंत का स्वप्न सँजोते हैं।

अब जान लिया है मैंने—
अंधकार
अंतिम सत्य नहीं।
हर पतझर के पार
कोई ऊष्मा
अमर बनी रहती है।
और मनुष्य
वास्तव में
उसी दिन जन्म लेता है,
जब वह
अपने भीतर जलते
उस अजेय ग्रीष्म को
पहचान लेता है।
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एक महीने पहले

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