बाहर जग का शोर अनश्वर,
मन में धीमा राग।
टूटे स्वर में छिपा हुआ है
जीवन का अनुराग॥
पूर्णता का स्वप्न सुनहला
छलता बारंबार।
अपूर्णों के मध्य खिलाता
मन अपना संसार॥
धूप-छाँह के इस पथ पर जब
थक जाता विश्वास,
भीतर कोई दीप जगा कर
भर देता उल्लास॥
नदियाँ अपने क्षत तट लेकर
सागर तक जातीं,
वैसे ही विकल आत्माएँ
अर्थ नया पातीं॥
जो बाहर के मेघ समेटे
वह कब शांति पाये?
जो अंतः की वीणा सुन ले
वह अमृत रस गाये॥
जीवन की सच्ची सार्थकता
यश या जय में नहीं,
अपने भीतर गूँज रहे उस
मौन निनाद में यहीं॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X