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"अनाम अनुगूँज"

                
                                                         
                            तुम क्षणभर का स्वप्न नहीं हो,
                                                                 
                            
नयनों की चंचल अभिलाषा,
तुम तो अंतर की निस्तब्धित
आराधन-मय मधु-भाषा।
मेरे सूने मानस-मंदिर
तुमसे ही आलोकित है,
ज्यों संध्या के मौन गगन में
एक अकेला शशि दीप्त है।

जब जीवन-पथ धूमिल होता,
दिशि-दिशि तम का जाल बिछे,
तब स्मृति बन तुम ही आतीं,
दीपक-सी पलकों में सिमटे।
तुम्हारी करुणा की रेखा
मन का अंधकार हरती,
ज्यों निर्जन वन की वीणा पर
कोई मधुर पवन झंकारे।

यह प्रणय देह का बंधन नहीं,
नश्वर चाहों का व्यापार,
यह तो युग-युग से बहता
अंतर का अमृत-निर्झर।
मैं जब भी स्वयं को खोजूँ,
तुम ही प्रतिध्वनित हो मन में,
ज्यों वन-उपवन में बिखरी हो
कस्तूरी की गंध पवन में।

लगता है यह प्रथम मिलन नहीं,
पहले भी परिचय था कोई,
किसी अनाम व्योम-तट पर
साथ जली थी ज्योति संजोई।
तभी तुम्हारी एक दृष्टि से
स्पंदित हो उठता अंतर,
ज्यों शांत झील में गिर जाए
अकस्मात चंद्रिका-कंकर।

यदि काल सभी पथ बदलाए,
यदि स्मृतियाँ भी क्षीण पड़ें,
तब भी प्राणों के आँगन में
तुम्हारे चरणचिह्न रहें।
क्योंकि प्रेम नहीं आकर्षण,
नश्वर सुख का क्षुद्र विधान,
यह आत्मा का शाश्वत स्वर है,
अनंत समर्पण का गान।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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