तुम्हें यदि हर साँझ लौटने का
अवकाश दिया जाए,
तो प्रतीक्षा की भीगी वीणा
किस स्वर में गुनगुनाए?
जो सदा समीप उपलब्ध रहे,
उसका क्या अभिनंदन?
नभ में स्थिर तारे को कब
मिलता व्याकुल नयन?
प्रिय!
विरह ही तो संबंधों का
अनदेखा स्पंदन है,
मिलन नहीं —
खो देने की आशंका ही
प्रेम का नीलाभ चंदन है।
मैंने देखा है —
अत्यधिक आश्वस्ति पाकर
स्मृतियाँ सो जाती हैं,
और सहज प्राप्त उषाओं पर
आँखें नहीं ठहराती हैं।
इसलिए
तुम्हें बाँधना नहीं चाहा,
केवल इतना चाहा —
मेरे एकांत के जल में
तुम्हारी आहट का कंप
अमर रहे।
यदि लौटने के
सभी द्वार खुले रहें,
तो हृदय की देहरी पर
कौन दीप जलाए रखे?
प्रेम वही,
जो अनिश्चित क्षितिजों में भी
अंतर का आलोक बचाए;
जो हर मिलन में
एक सूक्ष्म बिछोह की
श्वेत वेदना छिपाए॥
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