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अधूरे स्वप्नों का समय"

                
                                                         
                            जिम्मेदारियों की धूप में
                                                                 
                            
मन जल्दी सयाना हो गया,
कंधों पर घर टिकते-टिकते
भीतर का बच्चा खो गया।

कुछ सपनों की कोमल शाखें
सूखी आँखों में रह गईं,
रोज़ आवश्यकताओं की आँधी
मन की ऋतुएँ बह गईं।

दिन भर जग को ढोते-ढोते
स्वयं से दूरी बढ़ती गई,
भीतर बैठी मौन उदासी
धीरे-धीरे गढ़ती गई।

कभी दर्पण के सम्मुख ठहरा,
तो चेहरा अनजान लगा,
अपने ही जीवन में जैसे
मैं अतिथि समान लगा।

वक्त मिला सबको जीवन में,
पर खुद तक पहुँच न पाया,
भीतर का वह थका मुसाफ़िर
चुपचाप स्वयं को समझाया।

अब सोचता हूँ—
कुछ पल अपने नाम करूँ,
जो छूट गया वर्षों पहले,
उस स्वप्निल मन से बात करूँ।
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एक महीने पहले

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