मैंने देखा—
मनुष्य की पराजय
उस क्षण नहीं होती
जब उसके हाथ रिक्त रह जाते हैं,
बल्कि तब,
जब उसकी अभीप्सा
अपने ही भय के सम्मुख
मौन हो जाती है।
स्वप्न टूटते नहीं,
वे केवल
आत्मा की गहराइयों में उतरकर
अपने अर्थ बदल लेते हैं।
मेरे भीतर
एक अनाम आकांक्षा थी,
जो किसी शिखर को नहीं,
स्वयं को प्राप्त करना चाहती थी।
किन्तु हर ऊँचाई के मार्ग पर
निराशा
एक छाया की तरह साथ चली।
मैंने जाना—
विफलता कोई अंधकार नहीं,
वह चेतना का वह रिक्त प्रदेश है
जहाँ मनुष्य
अपने वास्तविक स्वर से परिचित होता है।
संसार सफलता को
उपलब्धियों के शोर में मापता रहा,
पर भीतर कोई धीमा स्वर कहता था—
सफल वही नहीं
जो पहुँच गया,
सफल वह भी है
जो टूटकर
अपने बिखराव को अर्थ दे सका।
क्योंकि यात्रा का सत्य
गंतव्य में नहीं,
उस सहनशीलता में छिपा है
जो निरंतर क्षरण के बाद भी
स्वप्न देखती रहती है।
कई बार
मैंने अपने ही संकल्पों को
धुँध में विलीन होते देखा।
विश्वास
हाथों से फिसलती रेत-सा लगा।
किन्तु उसी क्षण
भीतर कोई अदृश्य सत्ता
धीरे से कहती रही—
“निराशा अंत नहीं,
वह उस मौन का द्वार है
जहाँ मनुष्य
अपने होने की पुनः व्याख्या करता है।”
और मैं
फिर से चल पड़ा।
अब मैं जानता हूँ—
सफलता कोई शिखर नहीं,
वह एक आंतरिक विस्तार है।
अभीप्सा की प्रगाढ़ता,
स्वप्नों की विराटता,
और निराशाओं को
शांत गरिमा से धारण कर लेने की क्षमता—
यही मनुष्य का वास्तविक परिमाण है।
शेष सब
समय के प्रवाह में विलीन हो जाता है,
किन्तु जो भीतर
अविचल जलता रहता है—
वही
मनुष्य का शाश्वत आलोक है।
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