क्षितिज का कंचन हुआ मलिन,
दिनकर ने ली अस्ताचल ओट।
सज आई संकोचमयी साँझ,
लेकर अंतर पर मूक चोट॥
तिमिर-सेज पर जल उठे दीप,
लहरों का क्रंदन हुआ शांत।
सरिता का बहता मौन तरल,
लगता कोई तपस्वी क्लांत॥
नभ के पट पर सहसा उभार,
एक अलौकिक छवि का आभास।
जिसके सम्मुख फीका प्रतीत,
था नील गगन का सारा हास॥
मैं बैठा था तट पर एकाकी,
नयनों में भर केवल विरक्ति।
युग-युग से पलती रही जहाँ,
प्रतिबिंब-रूप में एक भक्ति॥
उस नीरवता के क्षण में तब,
तुम कौंध गई बनकर प्रकाश।
थी देह धरातल पर विवश,
पर छूने लगी मुक्त आकाश॥
तुम चाँदनी बन बिखरी ऐसे,
प्राणों का कण-कण महक उठा।
था खोज रहा जो रूप बाह्य,
वह अंतर्मन अब चहक उठा॥
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