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"आत्म-परिधि"

                
                                                         
                            धुंध की उस पहली धूप में
                                                                 
                            
मैंने एक हाथ छुआ था—
पर स्पर्श से पूर्व ही
एक सूक्ष्म रिक्ति
हम दोनों के बीच
अपना निवास बना चुकी थी।

हम साथ खड़े थे,
किन्तु प्रत्येक
अपनी-अपनी ऊष्मा के
अलग द्वीप पर।


अपेक्षाएँ—
रेत पर उकेरे गए सेतु हैं।
वे जुड़ना तो चाहती हैं,
पर पहली ही ज्वार-लहर
उनकी नींव बहा ले जाती है।

फिर दो तट
अपने मौन में लौट जाते हैं,
जैसे कभी
एक-दूसरे तक पहुँचे ही न हों।


हर मनुष्य
एक बंद आकाश है,
जिसमें उसकी निजी ऋतुएँ,
निजी विलाप,
निजी नक्षत्र जलते हैं।

जिसे तुम “अपना” कहते हो,
वह शायद केवल
तुम्हारी ही पुकार की प्रतिध्वनि है,
जो लौट आती है
किसी और चेतना से टकराकर।


संकट के क्षणों में
हर हथेली
पहले अपनी नाड़ी टटोलती है।
यह स्वार्थ नहीं—
अस्तित्व की आदिम स्मृति है,
जो बीज को सिखाती है
कि अंकुरण से पूर्व
अंधकार में अकेला रहना पड़ता है।


सहानुभूति
रात्रि में चमकते
चकमक पत्थरों जैसी है—
क्षणिक,
सुंदर,
पर अपर्याप्त।

हर व्यक्ति
अपने ही हिमकाल से गुजर रहा है,
अपने एकांत को
अपने ही वस्त्रों से ढँकता हुआ।


इसलिए
जब कोई हाथ बढ़े,
उसे ऋतु की तरह स्वीकारो—
आगमन के लिए कृतज्ञ,
प्रस्थान से निर्विकार।

और लौट आओ
अपने भीतर के उस केंद्र में,
जहाँ निर्वसन सत्य
धीमे से कहता है—
यात्राएँ साझा हो सकती हैं,
पर पथ
अंततः अकेले ही तय होता है।
 
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14 घंटे पहले

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