प्रसन्नता
किसी सुवर्ण-मुद्रा की दासी नहीं,
न वह राजप्रासादों की सीढ़ियों पर
घुँघरू बाँधकर नाचती है।
वह तो
मन के निर्जन वन में
अचानक फूट पड़ने वाली
किसी अनाम सरिता की ध्वनि है,
जिसे सुनने के लिए
आवश्यक नहीं वैभव,
आवश्यक है —
भीतर का निर्मल आकाश।
मैंने देखा है —
धुएँ से काली पड़ी झोंपड़ी में
एक वृद्ध किसान को
सूखी रोटी तोड़ते हुए
ऐसे मुस्कुराते,
मानो पृथ्वी का समस्त मधुमास
उसी के आँगन में उतर आया हो।
और मैंने यह भी देखा है —
रत्नजटित कक्षों में
असंख्य दीपों के मध्य
बैठे हुए वे लोग,
जिनकी आँखों में
रात का अथाह शून्य काँपता रहता है।
जीवन
स्वयं में न सुन्दर है, न असुन्दर;
उसे आकार देता है
मनुष्य का दृष्टिकोण।
यदि दृष्टि में करुणा हो,
तो पत्थर भी प्रतिमा बन उठते हैं;
यदि हृदय में केवल स्वार्थ हो,
तो पुष्पों से भरा उपवन भी
काँटों का वन प्रतीत होता है।
अतः
अपने भीतर की भाषा बदलो,
समय स्वयं
गीत गाने लगेगा।
त्याग
मनुष्य की पराजय नहीं,
उसकी सर्वोच्च विजय है।
जो स्वयं को बाँट देता है,
वही सबसे अधिक भरता है।
दीपक
अपने ही शरीर को गलाकर
दूसरों के लिए उजाला रचता है;
नदी
अपना जल खोकर
धरती को हरियाली देती है।
प्रकृति का प्रत्येक सत्य
मनुष्य से कहता है —
“संचय नहीं, समर्पण अमर है।”
संसार
बंधन से नहीं जुड़ता,
अपनत्व से जुड़ता है।
जहाँ केवल ‘मैं’ की दीवारें उठती हैं,
वहाँ संबंध
धीरे-धीरे धूल हो जाते हैं।
किन्तु जहाँ
कोई मनुष्य
दूसरे के दुःख को
अपने हृदय में स्थान देता है,
वहाँ
अजनबी भी
परिवार बन जाते हैं,
और सूनी राहों पर
वसन्त उतर आता है।
इसलिए
आज ही बदल दो
अपने सोचने का ढंग।
अपने भीतर के अंधकार में
एक क्षमा का दीप जलाओ,
एक करुणा का वृक्ष रोपो,
एक त्याग का झरना बहने दो।
तब देखोगे —
जीवन
केवल जीने की वस्तु नहीं रहेगा,
वह एक महोत्सव बनेगा,
जहाँ प्रत्येक श्वास
ईश्वर के चरणों में रखे हुए
किसी मौन पुष्प की तरह
सुगन्ध बिखेरती चलेगी।
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