तेरे लिए कोई मेसेज भी लिखता हूं,
तो भेजने की हिम्मत ही नहीं होती।
आते जाते यदि तुझे देख लेता हूं तो,
घबराकर आस पास छिप जाता हूं।
देने के लिए रोज एक फूल तोड़ता हूं,
उसे बिना दिए कॉपी में छिपा लेता हूं।
क्या करूं...? बेबस हूं.... हताश हूं...!
मैं नहीं कोई और तुझे प्रपोज कर देगा।
-चंद्र दत्त शर्मा
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