रास नहीं आ रही है सत्ता,
सब कुर्सी का है ये किस्सा।
पक्ष हो या विपक्ष,
जो जहां भी होता है,
अपनी अपनी करता है,
मौके की तलाश में बैठे हैं बाज,
है सब यह सियासत का खेल,
कैसे करके भी ताल लगे?
कब बनें सत्ता का हिस्सा?
रास नहीं आ रही है सत्ता,
सब कुर्सी का है ये किस्सा।
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