आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पहचान करते करते भूल भुलैया में खो गया।

                
                                                         
                            निकले थे जब हम सफर पर,
                                                                 
                            
तो सफ़रनामा सुनाना ही भारी पड़ गया।
कहां से लेकर कहां तक सुनाएँ?
हर सड़क हर गली और रास्ता बदल गया।
क्या क्या सुनाएं हर जगह की ?
पूरा का पूरा नक्शा ही बदल गया।
खड़ा रह गया चकाचौंध देखकर,
अता पता पूछ पूछकर दिमाग चकरा गया।
जिन रास्तों का पहले पता था,
पहचान करते करते भूल भुलैया में खो गया।
सीधा सादा मैं निकला घर से,
मिला कुछ नहीं सैर करके घर वापिस आ गया।
-चंद्र दत्त शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर