जो बची थी उम्मीद,
वो अब टूट गई है।
ना वो कभी मेरे थे,
ना मैं... अब कभी,
उनका हो पाऊंगा।
खिले खिले थे...,
कभी वो दिन,
आज अरमान,
मुरझा गए हैं।
देखे जो सपने,
धूमिल हो गए हैं।
दूरी हो गई इतनी,
इसे कैसे सह पाऊंगा?
हिम्मत है वो जज्बा,
इसी से काम चलाऊंगा।
-चंद्र दत्त शर्मा
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