जिन्हें तू अपना समझता है,
युद्ध में वो तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं।
ये अपने नहीं पक्के दुश्मन हैं,
जब इन्होंने पहले कुछ नहीं किया,
तुम्हारे लिए अब क्या करेंगे?
यदि ये सब अपने होते,
तो युद्ध तक नौबत नहीं आती।
हे पार्थ! जिद छोड़ और युद्ध कर,
तूने तो इन्हें अपना माना,
पर तुम्हें ये अपना नहीं मानते,
जिद छोड़...! और सामना कर।
क्योंकि इनकी बुद्धि ऐसी हो गई है,
जैसा खाए अन्न, वैसा हो जाए मन।
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