गर्दिश में हैं फिजाएं,
लुप्त हो गए नजारे।
सुप्त हो गए सितारे,
विपरीत हुई हवा रे।
कौन किसको सँवारे?
कर दो इसकी दवा रे।
जिनमें स्वदेश भावना,
श्रद्धा से सिर नवा रे।
-चन्द्र दत्त शर्मा
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