फ़ासले तो पहले से थे ही,
अब दूरियां भी बढ़ गई हैं।
थोड़ी बहुत गुंजाइश जो थी,
अब नाकामी में बदल गई है।
शेष कहने को अब क्या बचा?
रिश्तों में ही गांठ लग गई है।
कोशिश चाहे कैसी कर लो?
पहले जैसी वो बात नहीं है।
मिलने पर मुद्दे तो उठते रहेंगे,
पर उनका कोई अर्थ नहीं है।
-चंद्र दत्त शर्मा
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