बंधन में तो बंध गए हम,
पर दूसरा समझे जब।
कुछ दिन चला...,
जीवन का सिलसिला,
पता नहीं विश्वास में...,
विश्वासघात किया कब?
बेशक पास पास हैं हम,
दूरियां तो बढ़ ही गईं,
जिंदगी ऐसे ही चलेगी अब।
-चंद्र दत्त शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X