अरे लोगों...! जला लो...!
मुझे जी भरकर।
फिर कल आ जाऊंगा,
कहीं से भी निकल कर।
एक को जला लो,
अपने मन की भड़ास निकाल लो,
रावण अभी मरा नहीं है,
रह गया हूं मोम जैसा पिघल कर।
किसी ना किसी रूप में,
अभी मैं जिंदा हूं,
कभी भी निकल लेता हूं,
जहां ढूंढो...!
वहीं बैठा हूं मैं सिमट कर।
-चंद्र दत्त शर्मा
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