अपनों की निंदा और परायों की प्रशंसा,
यही तो अब तक चलता आया है।
मुझे तो ऐसा लगता है,
कि दुनिया इसी पर टिकी हुई है।
दूसरों पर दम भरते हैं,
अपनों को नेगलेक्ट करते हैं।
अपने आएं तो ठीक, ना आएं तो ठीक,
दूसरे आएं तो बेहद खुश होते हैं।
एक परिवार में ही अलग अलग रिश्ते हैं,
यदि एक की नहीं बनती,
तो दूसरा उन्हें आश्रय दे देता है।
ऐसे लोगों का क्या कहना?
जो अपनों में खुशी नहीं ढूंढते,
दूसरों में खुशी ढूंढते हैं।
उन्हें शायद...,
उन लोगों की फितरत का पता नहीं है,
सामने तो वो प्रशंसा जरूर करते हैं,
लेकिन बाद में निंदा ही करते हैं।
-चंद्र दत्त शर्मा
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