अब मैंने मान लिया कि कोई चाहत नहीं,
निगाहें ढूंढती हैं पर निगाहों में वो बात नहीं।
यह तो पहले पहल की कोई कसक थी,
अब भूल वश भी मिलन की कोई आस नहीं।
- चंद्र दत्त शर्मा
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