मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी,
मेरी आंखों पर पट्टी फर्ज की बंधी थी।
समझ नहीं पा रहा था,
मैं करूं तो क्या करूं?
संस्कार ही मुझे ऐसे मिले हैं,
मेरे नहीं तो दूसरों के चेहरे तो खिले हैं।
जितनी मुझमें सामर्थ्य थी,
बातों के तीर सहकर भी, मैं लगा रहा,
घाव तो हुए बहुत गंभीर...,
पर मुझे अपना वचन निभाना था,
मुझे अपने रास्ते से हटाने की कोशिशें हुईं,
तनकर खड़े थे कुछ मेरे विरोध में,
मैने भी हार ना मानी, नहा गया गंगा,
आज भी गिलानी है मुझको,
तीखे शब्दों के बाण सहे,
पर मैं मैं हूं... डटा रहा चट्टान बनकर,
बस अब और नहीं... बस अब और नहीं!!!
-चंद्र दत्त शर्मा
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