रोज़ तिल-तिल मर रहे थे,
ख़ुद से ही झगड़ रहे थे,
दिल-दिमाग़ की लड़ाई में
चक्की के पाट की तरह घिस रहे थे।
तन्हा थे और तन्हा हो रहे थे,
कैसे इतने शोर में भी ख़ामोश हो रहे थे,
अजनबी चेहरों में कोई अपना ढूँढ़ रहे थे,
और जो अपने थे, उनके चेहरे बेनक़ाब हो रहे थे।
वक़्त के मरहम से ज़ख़्म भर रहे थे,
कैसे हम बिना पतवार के मझधार में तर रहे थे,
किनारे की चाहत में मर रहे थे।
क्यों हम अपने से भी बेवफ़ा हो रहे थे,
कैसे इतने ख़ुद ही फ़ासले हो रहे थे,
चाहत की हर हद आज़मा रहे थे,
पर नाराज़गी अपने पे ही दिखा रहे थे।
आईने तोड़ रहे थे,
ख़ुद टुकड़ों में बिखर रहे थे,
पर नहीं, हम ख़ुद को महसूस हो रहे थे।
इसे मासूमियत का नाम दे रहे थे,
या कोई नया चेहरा हम भी अपना गढ़ रहे थे?
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