समय की थी क्रूरता, कौन करे यह काम
चौदह वर्ष बनवास के काटे सीता राम
पूनम का चंदा लगे आकाश में चित चोर
देख सभी एक टक रहे जैसे बावरी चकोर
अश्रु बिन कहे बता रहे, हृदय का संवेग
होंठ फड़फड़ाने लगे शब्द न फूटे एक
आँखों का आंखों से ऐसा हुआ मिलाप
धड़कन अब बढ़ने लगी मिला प्रेम प्रस्ताव
पतझड़ में सब मैं हैं काक, पिक, और मोर
वर्षा ऋतु में चहक उठे सब हुए भाव विभोर
असमंजस में है प्रकृति, ऋतुएँ हैं प्रतिकूल
कहीं सूखा कहीं बाढ़ है, फूल बन गए शूल
आँखों में तुम बसे हो, चाहे हो कितनी दूर
दिल पर दस्तक दे रही, यादें हैं भरपूर
पनघट पर पनिहारी ताके, सूखे नदी तालाब
कृषक एक टक देख रहा , कब बरसे बादल राग
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