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फूल और मानव

                
                                                         
                            फूल का जीवन कुछ पल का होता
                                                                 
                            
वह रात में विकसित हो सुबह खिलता
वह चारों ओर सुंदरता और महक बिखेरता
वह किसी और फूल से तुलना नहीं करता
परवाह नहीं करता उसे कोई और देखे
उसे बस महकना है सुंदरता बिखेरना है

मानव जीवन भी फूल के सामान होता
कुछ तय समय पर खिलता, अपने गुण
प्रेम करुणा दया परोपकार बिखेरता
अंत में पूर्णता को प्राप्त कर
मिटटी में मिलकर नया जीवन पाता

मानव उन गुणों का आनंद नहीं ले पता
प्रयत्न से पहले फल के विषय में सोचता
उसका जीवन हिसाब किताब में बीतता जाता
मानव दूसरों से तुलना कर समय व्यर्थ कर देता

हर मनुष्य में अलग प्रतिभा होती है
उसे पहचान कर निखारने का प्रयत्न करे
तो उसका जीवन भी फूल जैसा बन जाए
मानव तब सुन्दर होता जब वह अहंकार रहित कार्य करता

कोई प्रशंसा करे या निंदा
चाहे कोई उसे महसूस करे या न करे
उसे तो प्रेम करुणा दया बिखेरना है
अतः मानव यदि फूल की तरह बन जाए
सही मायने में तभी उसका जीवन सार्थक बन जाये
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एक घंटा पहले

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