मनुष्य हर दम यत्न करता
ईश्वर को पाने को खोजा करता
कभी मंदिर कभी तीर्थ कभी मन्त्रों
में पाने की चाहत रखता
कभी आकाश में निहारा करता
शायद ऊपर वाला नज़र आ जाये
जिसके मिल जाने से जीवन सार्थक हो जाए
उसे पाने के लिए अपने मन में झांको
यदि भीतर दया करुणा निःस्वार्थ प्रेम मिल जाए
ख़ुशी शान्ति संतोष आनंद का साम्राज्य हो
तो समझो मानव ईश्वर को पा लिया
जिस ह्रदय में दया नहीं, करुणा प्रेम नहीं
वहां उस परमशक्ति का निवास भी नहीं
जो भगवान् को प्रसन्न करने को
रात दिन प्रयत्नरत करता
धुप दीप पुष्प तिलक योग से लुभाना चाहता
परन्तु मन अहंकार द्वेष ईर्ष्या से भरा रहता
उसे परमपिता नहीं मिल सकता
क्या कभी सोचा है तुम्हारी वजह से
किसी के जीवन में उजाला हो जाए
किसी के चेहरे पे मुस्कान आ जाये
किसी को प्रेम, शांति मिल जाए
तो समझो तुमने ईश्वर को पा लिया
भीतर से जो साफ़, करुणामय हो क्षमाशील हो
ईश्वर उसी मनुष्य के ह्रदय में रहता
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