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मन की निर्मलता

                
                                                         
                            ज्ञान न शुभ होता है न अशुभ
                                                                 
                            
यह जिसके हाथ आ जाता
वैसा ही स्वरूप बना लेता
आत्मा का प्रकाश पा कर ज्ञान
यज्ञ बन वातावरण शुद्ध करता
अहंकार का साथ पा कर ज्ञान
अग्नि बन सबको जला देता
आधुनिक मानव भौतिक ज्ञान से तो ओतप्रोत हो गया
किंतु अंतःकरण तो खाली ही रहा
तथ्यों से भरा दिमाग
सोच कुंठित कर रहा
हृदय संवेगों के अभाव से भर रहा
बुद्धि हो गई तीव्र
पर दिशाहीन हुआ
गति है प्रचंड पर गंतव्य का नहीं पता

तथ्यों का संग्रह नहीं बनता ज्ञानी
जिस प्रकार ईंटों के ढेर से मकान नहीं बन सकता
उसी प्रकार तथ्यों का ज्ञान होने से ही प्रज्ञावान नहीं बन सकता
असली ज्ञान यदि पाना चाहो
पहले अंतःकरण को शुद्ध कर लो
अशुद्ध पात्र में रखा अमृत भी जैसे दूषित हो जाता
ज्यों हमारे मनीषियों ने ज्ञान से पहले
अंतःकरण की शुद्धि बतलाई
अतः सच्चा ज्ञान वह नहीं जो स्मृति पटल को भर दे
सच्चा ज्ञान वह होता जो अहंकार को दूर कर मन निर्मल कर दे
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एक महीने पहले

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