बरसों बाद एक वृद्ध शिक्षक की
हो गई छात्र से भेंट
दोनों एक दूसरे को देख
रह गए आंखें टेक
शिक्षक तो वही का वही रहा
बस बाल पक गए और आंख पर चश्मा चढ़ गया
छात्र पास के एक भट्टे पर मजदूरी कर रहा था
धूप तेज थी पीठ पर बोझ
माथे पर पसीना टपक रहा था
गुरु जी को देख छात्र ठिठक गया
प्रणाम गुरुजी पहचाना आपने
हां हां चश्मा ठीक करते हुए
शिक्षक बोला ओह तुम दयाल
कितने वर्षों बाद, क्या कर रहे हो
दयाल मुस्कुराते हुए
गुरुजी बस ईंट पत्थरों की पढ़ाई कर रहा हूं
तुम तो बहुत होशियार थे, गणित में सबसे अव्वल
तुम्हे तो अधिकारी बनना चाहिए था
दयाल चुप रहा, कहने लगा घर जा कर पत्र में लिखूंगा सब
अगले दिन गुरुजी के घर पत्र आया
गुरुजी आपने कहा था मैं अधिकारी बनूँगा
पर गुरुजी आपकी मेहनत और मेरा ज्ञान सब दूर होता गया
जब आप पढ़ाई में कम दूसरे कामों में ज्यादा व्यस्त हो गए
कभी मतदाता सूची, कभी जनगणना, और कभी चुनाव ड्यूटी, कभी सर्वे कभी किसी योजना के फॉर्म कभी पोर्टल में व्यस्त रहे
हम गरीब बच्चों के सपने अधूरे ही रह गए
इसमें आपका कोई दोष नहीं है गुरुजी
पत्र पढ़कर गुरु और शिष्य दोनों की आंखों में आंसू आ गए
इसलिए कि छात्र अधिकारी नहीं बन सका
और इसलिए कि शिक्षक उसे काबिल नहीं बना सका
जब शिक्षक को शिक्षक नहीं रहने देते
तो केवल शिक्षक ही पराजित नहीं होता
बल्कि पूरी पीढ़ी ही हार जाती है
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