सिखा न सकी जो उम्र भर,
वो तमाम किताबें भी कभी,
ज़िंदगी ने एक पल में सिखा दिया,
जब चेहरों की असलियत दिखी।
करीब से देखा तो जाना,
हर मुस्कान में खुशी नहीं होती,
कुछ होंठ हँसते रहते हैं,
पर आँखों में बरसात होती।
जो अपने लगते हैं अक्सर,
वही सबसे दूर निकल जाते हैं,
और जो खामोश खड़े रहते हैं,
वो ही हर दर्द समझ जाते हैं।
चेहरे आईने नहीं होते,
जो मन की तस्वीर दिखा दें,
इंसान को पहचानना हो,
तो उसके कर्मों को पढ़ा दें।
अब न चेहरों पर भरोसा है,
न झूठी बातों के जाल पर,
मैंने इंसान पढ़ना सीख लिया है,
उसके व्यवहार और ख़याल पर।
"किताबें ज्ञान देती हैं,
मगर इंसान अनुभव देता है;
जो सीख ज़िंदगी लोगों से दिलाती है,
वो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती।"
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