ग़ज़ल:
बात ऐसी नहीं जो तुमसे कह ना सकूं
बात ऐसी नहीं जो तुमसे कह न सकूं
सितम ऐसा नहीं जो मैं सह न सकूं ।
आह भरना भी लेकिन मुहाल हो गया
घबराने लगा हूं तन्हा मैं रह न सकूं ।
वस्ल में क्या हुआ याद कुछ भी नहीं
हिज्र में क्या हुआ ये मैं कह न सकूं ।
ख़ामोशियों का भी अपना एक शोर है
सब तरफ अम्न है ये मैं कह न सकूं।
कोई तो हो जो समझे मेरे मन की बात
हर किसी से हाल-ए-दिल मैं कह न सकूं।
-ओम गोपाल शर्मा
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