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अपने दुश्मनों का भी हम

                
                                                         
                            अपने दुश्मनों का भी हम एहतराम करते हैं।
                                                                 
                            
जिनकी बदौलत ज़हां में अपना नाम करते हैं।

अच्छाई करने वालों को ज़हां में कौन पूछता है।
इसलिए गाहे-बगाहे ज़ुर्म सरे-आम करते हैं।

दिल तड़पता रहता है मगर हम उफ़ नहीं करते।
ख़ुदा ने सोंपा है हमें जो हम वो काम करते हैं।

ये सच है वक़्त ने हमेशा बेवफाई की हमसे
बीते वक़्त को फिर भी हम सलाम करते हैं।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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