आईने में बार-बार यूं खुद को निहारा न करो।
नज़र लग जाएगी यूं जुल्फों को संवारा न करो।।
माना ज़हां में कोई नहीं है तुम्हारे मुकाबिल ।
रुख़ -ए -ज़ेबा पर यूं इतना इतराया न करो।।
गुरूर-ए-हुस्न दो दिन का मुसाफ़िर है सनम।
इस फ़ानी दौलत पर यूं इतना इतराया न करो।।
वफ़ा से आज तलक तुम्हारा वास्ता नहीं रहा।
वफ़ा का बार-बार यूं दावा जताया न करो।।
शमा का काम है महफ़िल को रोशन करना।
शोला-ए-फ़ित्ना बन यूं आग लगाया न करो।।
लोगों की नजर में न आ जाए इश्क अपना'ओम'।
हमारे घर के चक्कर यूं गाहे-बगाहे लगाया न करो।।
-ओम गोपाल शर्मा
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