मौन समर्पण सहज सँवारे
इंगित पहुँचे तेरे दारे
कृत्रिम क्रोध की आँखें देखी
कह न सके कुछ भी बेचारे
प्रेम स्वयं को गीत बनाकर
तुम तक आया साँझ-सकोरे
वही सनातन एक प्रश्न के
'पूर्वज्ञात' उत्तर सुनने को
लिख डाले पत्र हजार.....
है तुमको मुझसे प्यार ?
बताओ आज हमें !
'पूर्वज्ञात' थे सारे उत्तर
खोज रहे थे साधक बनकर
सारी सिद्धि 'हाँ' में छिपी थी
मौन खड़ा था बाधक बनकर
इसी मौन में शब्द पिरोने
और 'स्वयं' को पूरा खोने
खुसरो के उस दरिया में
है जिसकी उल्टी धार
उसी में डूब गये हर बार
है तुमको मुझसे प्यार ?
बताओ आज हमें !
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